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अंक के प्रमुख आकर्षण

जुलाई 2016

संपादकीय

मदारी के तमाशे में अटका लोकतंत्र

युवा संवाद - जुलाई 2016 अंक में प्रकाशित

 

केन्द्र की भाजपा सरकार ने अपने दो साल पूरे कर लिए हैं और उसकी कार्यशैली ने साफ दर्शा दिया है कि भारत में गरीबों और वंचितों के लिए अब कोई जगह नहीं बची है। परंतु परेशानी यह है कि गरीबों के पास तो कहीं और जाने का ठौर भी नहीं है। उच्च व मध्य आय वर्ग तो अपने बच्चों को ‘यू एस’ आदि देशों में भेजकर निश्चित हो रहा है...

 

आगे पढ़े...

यह जो बिहार है : मुक्ति की आस में गंगा — योगेंद्र

मजदूर क्रांति : काॅरपोरेट मीडिया से गायब... — युवा संवाद ब्यूरो

चिंतन : पूंजीवादियों को चाहिए राष्ट्रवाद... — सच्चिदानदं सिन्हा

यू.आई.डी. : आधार विधेयक और हिटलर का... — लता जिश्नू

न्याय : सिलिकोसिस पीड़ितों की यादगार... — अमूल्य निधि

प्राकृतिक संसाधन : सरकार के नहीं समाज के... — अशाके भारत

चम्पारण सत्याग्रह : एक शताब्दी का सफर — एल. एस. हरदेनिया

जलवायु परिवर्तन : बढ़ती गरमी से सुलगती आर्थिक... — टिम रेडफोर्ट

अकाल : कुदरत नहीं मनुष्य की देन है..... — रमेश कुमार दुबे

जैव विविधता : विज्ञान जीएमओ और हमारा खाना — डाॅ. वंदना शिवा

इतिहास : इंग्लैंड में अंग्रेजी कैसे लागू .... — डाॅ. गणपति चंद्र गुप्त

खाद्य सुरक्षा : बीज बचेगा तो हम बचेंगे — निक डियरडेन

चिंतन : नासमझी का नया दौर — चिन्मय मिश्र

छत्तीसगढ़ : लोकतांत्रिक भारत का पुलिस राज — पुष्कर राज

बाबा साहब आंबेडकर : परिपूर्ण विचार के संवाहक — राजीव मिश्र

दस्तावेज-4 : पटना टू हजारीबाग सेंट्रल जेल — श्रीकातं

पर्यावरण : पानी बचाने की सकारात्मक पहल — श्रीपाद धर्माधिकारी

क्रांतिकारी शहीद : वीरांगना प्रीतिलता वादेदार — रामकिशारे

बेबाक : अविश्वसनीय किंतु सत्य जैसी खबर — सहीराम