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हिंसा का डेरा

युवा संवाद -  सितंबर 2017 अंक में प्रकाशित

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बलात्कार के मामले में पंचकूला की सीबीआइ अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद बड़े पैमाने पर उपद्रव और हिंसा का जो नजारा देखने में आया उसकी जवाबदेही से किसी भी सूरत में हरियाणा सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। यह कोई भूकम्प या सुनामी जैसी स्थिति नहीं थी जिसके बारे में कोई पूर्वानुमान न रहा हो और मुसीबत अचानक टूट पड़ी हो। हालात की संवेदनशीलता एकदम जाहिर थी। खुफिया एजेंसियों ने भी आगाह कर रखा था कि अदालत का फैसला राम रहीम के प्रतिकूल आया तो अनहोनी हो सकती है।

 

पर हरियाणा सरकार ने जहां घटनाक्रम की गंभीरता को समझने में अपरिपक्वता दिखाई वहीं हालात को संभालने में वह नाकाम रही। किसी के लिए भी यह समझ पाना मुश्किल था कि धारा 144 लागू होने के बावजूद, अदालत का फैसला सुनाए जाने के लिए निर्धारित समय से अड़तालीस घंटे पहले ही कोई पचास हजार लोग पंचकूला में कैसे जमा हो गए। फिर, प्रतिबंधात्मक आदेश को धता बताते हुए डेरा समर्थकों के इकट्ठा होने का सिलसिला लगातार जारी रहा।

 

वे पार्कों में जमा हो गए, सड़कों पर पसर गए। पुलिस जैसे मूकदर्शक बनी रही। हिंसा फैलने पर कई जगहों से पुलिस के भाग खड़े होने की भी खबर आई। चूंकि पिछले विधानसभा चुनाव में डेरा ने भाजपा का खुलकर समर्थन किया था, कहीं इसीलिए तो राज्य सरकार उनके प्रति नरमी नहीं बरत रही थी? कहीं पुलिस का यह व्यवहार ‘ऊपर से’ निर्देशित तो नहीं था? जो हो, अपने कर्तव्य के प्रति काहिली के लिए खट्टर सरकार और हरियाणा पुलिस को पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट की कड़ी फटकार सुननी पड़ी। हाइकोर्ट ने यह तक कहा कि पुलिस महानिदेशक को क्यों न बर्खास्त कर दिया जाए!

 

किसी भी सरकार का पहला दायित्व नागरिकों के जान-माल की रक्षा करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना होता है। पर खट्टर सरकार इसमें कई बार बुरी तरह नाकाम साबित हुई है। जाट आंदोलन के समय तो जैसे सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं बची थी। उससे पहले, 2014 में एक और ‘आध्यात्मिक गुरु’ रामपाल की गिरफ्तारी के समय भी खट्टर सरकार की खूब किरकिरी हुई थी। लेकिन लगता नहीं कि उन कड़वे अनुभवों से खट्टर सरकार ने कोई सबक सीखा हो। उसकी अदूरदर्शिता और काहिली का ही नतीजा था कि जो हालात प्रतिबंधात्मक आदेश का कड़ाई से पालन, सख्त निगरानी और पुलिस के सहारे नियंत्रित हो सकते थे वे बेकाबू हो गए।

हालात को संभालने के लिए पुलिस के अलावा काफी संख्या में सीआरपीएफ तैनात करनी पड़ी। सेना भी बुलानी पड़ी। कर्फ्यू लगाना पड़ा। मोबाइल, इंटरनेट स्थानीय रूप से ठप करने पड़े। फिर भी, स्थिति यह हुई कि अट्ठाईस लोग हिंसा या हिंसा को कुचलने के लिए की गई कार्रवाई की भेंट चढ़ गए। क्या पता, यह संख्या और बढ़ जाए। बहुत-से लोग घायल हैं। एक हजार से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेने केबाद भी उपद्रव का सिलसिला चलता रहा। पंजाब में भी कई जगह तोड़-फोड़ और आगजनी की घटनाएं र्हुइं।

 

हाइकोर्ट ने एक और सख्त कदम उठाते हुए, निजी और सार्वजनिक संपत्तियों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए डेरा की संपत्ति के बारे में जानकारी मांगी है। बहरहाल, राम रहीम प्रकरण कानून-व्यवस्था की भयानक दुर्गति और राज्य सरकार की घोर नाकामी आदि के अलावा भी कुछ सवालों पर सोचने को विवश करता है। यह धर्म या अध्यात्म का कौन-सा रूप विकसित हो रहा है जिसमें बेशुमार दौलत, तरह-तरह के धंधे, अपराध, प्रचार की चकाचैंध और सांगठनिक विस्तार का मेल दिखाई देता है। इसमें सब कुछ है, बस धर्म या अध्यात्म का चरित्र नहीं है।

 

इस तरह के धार्मिक समूह अपने अनुयायियों या समर्थकों और साधनों के सहारे चुनाव को भी प्रभावित कर सकने की डींग हांकते हैं, और विडंबना यह है कि कुछ राजनीतिक उनके प्रभाव में आ भी जाते हैं। यह धर्म के पतित रूप और राजनीति के पतित रूप का मेल है। और अदालत का फैसला परोक्ष रूप से इसके खिलाफ भी एक संदेश है।