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रसातल में अर्थव्यवस्था

युवा संवाद - सितंबर 2019 अंक में प्रकाशित

राजनीति और अर्थशास्त्र में एक बड़ा अंतर है। अर्थशास्त्र में 2 और 2 मिलकर 4 होते हैं, जबकि राजनीति में पुराने 2 में नया 2 मिलानेसे नया शून्य भी पैदा हो सकता है। मिसाल के तौर पर, बालाकोटहोने से पुलवामा शून्य हो गया। 370 हटने से उन्नाव कांड याद नहींरहा। लेकिन अर्थशास्त्र गणित पर टिका है। इसमें सब कुछ जुड़तारहता है, जिसका संचयी प्रभाव आज नहीं तो कल जरूर दिखता है।यही भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ हुआ। याद कीजिए, कैसे नोटबंदीऔर जीएसटी के बाद केंद्र सरकार ने पूरा जोर इन फैसलों कोकामयाब बताने में लगा दिया था जबकि नकदी पर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाका चक्का थमने के संकेत साफ दिख रहे थे। फिर भी केंद्र सरकारके नीति-निर्माता कारों की ब्रिकी, ओला के रजिस्ट्रेशन के आंकड़ेदिखाकर आलोचकों का मुंह बंद करते रहे। बेरोजगारी में बढ़ोतरी कीखबरों को कैसे खारिज किया गया?

 

लेकिन अब भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती छिपने वाली नहीं है।उद्योगपति अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन देकर आर्थिक बदहाली काढिंढोरा पीट रहे हैं। ऑटोमोबाइल सेक्टर की हालत किसी से छिपीनहीं है। वाहनों की बिक्री में 19 साल की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज कीगई है। ऑटोमोबाइल से जुड़े उद्योगों में करीब दो लाख लोगों कीनौकरी जा चुकी हैं जबकि 10 लाख लोगों की नौकरी जाने का खतराहै। मारुति सुजुकी जैसी दिग्गज कंपनी तीन हजार अस्थायी कर्मचारियोंकी छंटनी कर चुकी है। पारले जैसे ब्रांड ने जीएसटी की ऊंची दरोंका हवाला देते हुए 8-10 हजार लोगों को नौकरी से हटाने कीआशंका जताई है। रोजाना किसी ना किसी सेक्टर से छंटनी, एनपीएबढ़ने या राहत पैकेज मांगने की खबरें आ रही हैं। हैरानी की बात हैकि यह सब मजबूत बहुमत और मजबूत नेतृत्व वाली सरकार के दौरमें हो रहा है। संकट की जड़ें अतीत के आर्थिक फैसलों औरअंतरराष्ट्रीय कारकों के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की चुनौतियोंसे भी जुड़ी है। कारों के साथ-साथ दुपहिया वाहनों की बिक्री मेंगिरावट से इस बात को समझा जा सकता है। लेकिन चिंता की बातयह है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के इस संकट को दूर करने के लिएवही तौर-तरीके अपनाए जा रहे हैं, जिनकी वजह से हालात इतनेबदतर हुए हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और छोटे उद्योगों तथा कारोबारियोंको मदद देने के बजाय बड़े उद्योगपतियों को आर्थिक पैकेज देने कामाहौल बन चुका है।

 

तमाम मीडिया रिपोर्ट बताती रही कि नोटबंदी के बाद मंडियों मेंकारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है, और किसानों को उपज का उचितदाम नहीं मिल पा रहा। देश भर की मंडियों में साल भर उपज कीखरीद-फरोख्त एमएसपी से नीचे होने की खबरें आती रही, लेकिनसरकार का पूरा जोर किसानों को डेढ़ गुना दाम देने के प्रचार पररहा। पिछले पांच साल से किसानों की आमदनी दोगुनी करने के दावेभी खूब हुए। बगैर यह समझे कि इन पांच सालों में किसानों कीआमदनी कितनी बढ़ी है। 2013 के एनएसएसओ सर्वे के बाद किसानोंकी आमदनी का डेटा ही नहीं है। यह हकीकत से आंख मूंदना नहींतो फिर क्या है? क्या इससे सच्चाई बदल जाएगी?

 

लोक सभा चुनाव से पहले देश में बेरोजगारी दर 45 साल मेंसबसे ज्यादा होने की रिपोर्ट लीक हुई तो सरकार ने पूरा जोर इसखबर को गलत साबित करने में लगा दिया। चुनाव के बाद यह खबरसही निकली। जब तक मर्ज की पहचान ही नहीं होगी, तो इलाज कैसेहोगा? जब सरकार के आर्थिक सलाहकार और रिजर्व बैंक के गवर्नरअपनी जिम्मेदारियों से तौबा कर रहे थे, तब ही समझ जाना चाहिए था कि हालात कैसे हैं। लेकिन इन संकेतों को भांपने के बजायआगाह करने वालों पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगे।

सरकार नारों और दावों से अर्थव्यवस्था को सुधारने में लगी रही। अर्थव्यवस्था के संकटजुड़ते चले गए। आज ना देश का निर्यात बढ़ रहा है, ना किसानोंकी आमदनी बढ़ रही है। नौकरियां जा रही हैं, और बैंकों पर कर्जका बोझ बढ़ता जा रहा है। अर्थव्यवस्था चैतरफा संकंट से घिर चुकीहै, जिसका ठीकरा अत्यधिक जनसंख्या पर फोड़कर सरकार अपनीजिम्मेदारी से नहीं बच सकती।

 

अब कहा जा रहा है कि ज्यादा आर्थिक सुधारों की वजह सेयह हाल हुआ। साल 2016-17 में जीडीपी की वृद्धि दर 8 फीसदीसे ऊपर पहुंच गई थी, जो 2018-19 की आखिरी तिमाही में घटकर5.8 फीसदी रह गई है। एसबीआई के एक हालिया अध्ययन मेंमौजूदा आर्थिक सुस्ती के लिए वैश्विक अनिश्चितता और बुनियादीदिक्कतों के अलावा शहरी और ग्रामीण मजदूरी में धीमी ग्रोथ कोवजह माना गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ साल पहले तक शहरीऔर ग्रामीण मजदूरी 10 फीसदी से ज्यादा की दर से बढ़ रही थी।2010-11 में कॉरपोरेट वेतन में बढ़ोतरी 20.5 फीसदी तक पहुंच गईथी। जो 2018-19 में घटकर 10 फीसदी से नीचे आ गई है। इसीतरह 2013-14 में ग्रामीण मजदूरी में वृद्धि 27.7 फीसदी तक पहुंचगई थी जो 5 फीसदी से नीचे आ गई है। 2.14 में पहले ग्रामीणमजदूरी बढ़ने के पीछे कंस्ट्रक्शन में तेजी अैर मनरेगा का बड़ा हाथमाना जाता है।

 

हाल के वर्षों में रियल एस्टेट में मंदी के चलते कंस्ट्रक्शन सेक्टरका बुरा हाल है जबकि मनरेगा को भी सरकार बहुत तवज्जो नहींदे रही है। इस बीच, कई राज्यों में किसानों की कर्जमाफी और केंद्रसरकार द्वारा किसानों के खाते में सालाना 6 हजार रुपये डालने जैसेउपायों से कुछ पैसा किसानों के पास पहुंचा जरूर है, लेकिन एकतो यह राहत भूमिहीन किसानों को नहीं मिलती, दूसरा उपज कीकीमतों में गिरावट से हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए नाकाफीहै। फिर ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में सुस्तीकी वजह अस्थायी या निचले स्तर की जो नौकरियां गई हैं, उसकेअसर के चलते ग्रामीण क्षेत्रों पर ज्यादा पड़ा है। निर्यात - के मोर्चेपर सुस्ती का असर भी गांव-कस्बों तक पहुंचा है, और यह छोटेउद्योग-धंधों को चपेट में ले चुका है। उल्टबांसी देखिए, जब शहरोंमें नौकरियाँ जा रही हैं, तो केंद्र के नीति-निर्माता कृषि संकट दूरकरने के लिए लोगों को खेती से बाहर निकाल कर मैन्युफैक्चरिंग मेंलाने के ख्वाब दिखा रहे हैं, जबकि असलियत यह है कि शहरों मेंनौकरी गंवाने वाले बहुत-से लोग गांव और खेती का रुख करते हैं।

 

इस बीच, मंदी के नाम पर उद्योग जगत की ओर से राहतपैकेज की मांग तेजी से उठने लगी है। एक के बाद एक इंडस्ट्रीअपनी खस्ता हालत की दुहाई देते हुए राहत पैकेज मांग रही हैजबकि एक अनुमान के मुताबिक, पिछले 10 साल में उद्योग जगतको करीब 18 लाख करोड़ रुपये की राहत सरकार से मिल चुकी है,और तकरीबन इतना ही बैंकों का कर्ज डूबने के कगार पर है। इसकेबावजूद उद्योग जगत रोजगार पैदा करने में नाकाम रहा और अबसरकार को खुलेआम छंटनी की धमकियां दे रहा है। आर्थिक संकटके समय भी अगर सरकार ने मेक इन इंडिया, ईज ऑफ डूइंगबिजनेस, डबलिंग फार्मर्स इनकम जैसे दावों की ईमानदारी से समीक्षानहीं की तो फिर से ये नाकामियां जुड़ती चली जाएंगी और विकरालरूप धारण करके हमारे सामने होंगी।