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सच्चाई को चाहिए आजादी

युवा संवाद - सितंबर 2018 अंक में प्रकाशित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुर्भावना में ही सद्भावना की बात कह दी है। विपक्ष के आभासी महागठबंधन के लिए उनका यह कहना ठीक है कि वह विकास करने नहीं विरासत बचाने निकला है। निश्चित तौर पर विरासत बुरी चीजों की नहीं अच्छी चीजों की होती है और वह है हमारे स्वाधीनता संग्राम के महान आदर्शों की विरासत। इस देश का विपक्ष अगर समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास द्वारा झटके में कहे गए जाति और धर्म के वोट बैंक के गुणा भाग से ऊपर उठकर उसे समझ जाए और सत्ता पक्ष को समझा सके तो इससे देश नहीं दुनिया का भी कल्याण होगा। स्वाधीनता संग्राम की सबसे बड़ी विरासत है गांधी के सत्य के प्रयोग की विरासत और उसी के नैतिक बल ने ब्रिटिश साम्राज्य को नतमस्तक कर दिया था और आज वही सबसे ज्यादा खतरे में है। इसलिए सत्य को ही बचाना हम सबका धर्म होना चाहिए।

 

हिंसा, तनाव, कटुता और विभाजन की नई आशंकाओं से घिरे हुए भारत की आज मूल समस्या असत्य की है और अगर उसका इलाज कहीं है तो सत्य के आग्रह में। सत्य का यह प्रश्न महज चैनलों और सोशल मीडिया के फेक न्यूज और रीयल न्यूज तक सीमित नहीं है। यह किसी एक नेता की जुमलेबाजी और गलत तथ्य तक भी नहीं है। यह अर्थशास्त्र के जोड़ तोड़ से रचे गए आंकड़ों और हार्वर्ड बनाम हार्डवर्क तक केंद्रित नहीं है। यह मनुष्य के अंतःकरण से लेकर विज्ञान की पद्धतियों के माध्यम से प्राप्त ज्ञान तक फैला हुआ है। उसमें कुछ आध्यात्मिक नियमों की स्वीकार्यता से लेकर विज्ञान के नियमों का स्थान है। आज भारत के 72 वें स्वतंत्रता दिवस पर अगर हम किसी चीज को पाने का आह्वान कर सकते हैं तो वह सत्य की पूर्ण आजादी का। अगर इस देश का वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, सच्चा धार्मिक व्यक्ति और रचनाकार इसी लक्ष्य को लेकर चले तो शायद हम तमाम आपदाओं से बच सकते हैं।

 

सच्चाई और कलाकारों का एक रिश्ता महात्मा गांधी परिभाषित करते हैं। वे कहते हैं कि सत्य के लिए शोध पहली चीज है सौंदर्य और शुभत्व उसमें अपने आप ही जुड़ जाएंगे इसीलिए वे ईसा मसीह और मोहम्मद साहब को सर्वोत्कृष्ट कलाकार मानते थे और कुरान को एक सुंदर रचना। सत्य की सरलतम परिभाषा देते हुए वे कहते हैं कि जो तुम्हारे अंतःकरण की आवाज कहे वह सत्य है। लेकिन अंतःकरण की वह सच्ची आवाज अगर आप किसी साधना के बिना सुनने की कोशिश करेंगे तो वही झूठ सुनाई देगा जो हमारा गौरक्षक दल (गौगुण्डे)बोल रहा है या संविधान जलाने वाले मनुवादी कह रहे हैं या स्त्रियों के विरोधी मुल्ला याआतंकी कहते हैं।

 

 

सत्य के शोधकर्ताओं की लंबी विरासत है और गांधी और भगत सिंह दोनों उसी के स्तंभ हैं। फर्क यही है कि गांधी के सत्य में अहिंसा शामिल थी। अगर भारतीय संस्कृति के लिए सत्य इतना अहम न होता तो स्वामी दयानंद सत्यार्थ प्रकाश की रचना न करते और महात्मा ज्योतिबा फुले सत्यशोधक समाज न गठित करते। सत्य की व्याख्या करते हुए शर शय्या पर लेटे भीष्म ने महाभारत के शांति पर्व में युधिष्ठिर ने उसके 13 अवयव बताए थेः- निष्पक्षता, संयम, विशाल हृदयता, क्षमा, शील, धैर्य, सहिष्णुता, अनाशक्ति, आत्मपरीक्षण, गरिमा, दृढ़ता, नैरंतर्य और निरापदता। गांधी अपने जीवन में सत्य के इन्हीं तत्वों को खोजने और अपनाने की कोशिश कर रहे थे। यही वजह है कि उनके लिए सत्य एक विशाल वृक्ष की तरह था जिसका पोषण करते हुए वे मानवता से तरह तरह के फल पाने का आग्रह कर रहे थे। लेकिन  यह सत्य उसी को प्राप्त हो सकता है जो विनम्र हो और अहंकार से रहित हो। अहंकारी के लिए सत्य को प्राप्त करना बेहद कठिन है जबकि एक शिशु के लिए उसे प्राप्त करना आसान। यही वजह है अपने नए कपड़ों के साथ शोभा यात्रा में निकले अहंकारी राजा को देखकर एक अबोध बालक ही कह सकता है कि राजा नंगा है।

 

आज सच्चाई की पूर्ण आजादी का आह्वान इसलिए जरूरी है क्योंकि हम जार्ज आरवेल के उपन्यास 1984 के कथानक की तरह पूरी तरह ‘डबल स्पीक’ में फंस चुके हैं। किसी से मैत्री करने को तुष्टीकरण कहा जाता है और प्रेम करने को लव जेहाद। संदेह और नफरत के आधार पर किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति को पीट पीट कर मार डालना गोरक्षा कहा जाता है और सूचना रोकने वाले विभाग को सूचना प्रसारण मंत्रालय कहा जाता है। उसी तरह सिर्फ वीजा पासपोर्ट बनाने वाले विभाग को विदेश मंत्रालय कहा जाता है। गणेश जैसे देव की कल्पना को प्लास्टिक सर्जरी जैसा विज्ञान बताया जाता है और पुष्पक विमान की काल्पनिक उड़ान को वैमानिकी विज्ञान बताया जाता है। ऐसी ही कल्पना 1984 में की गई है जहां झूठ बोलने वाले मंत्रालय को सत्य के मंत्रालय का नाम दिया गया है और युध्द करने वाले मंत्रालय को शांति मंत्रालय का नाम दिया गया है।

 

प्रसिद्ध साहित्यकार यूआर अनंतमूर्ति ने जीवन के आखिरी दिनों में ‘हिंदुत्व या हिंद स्वराज’ नाम की पुस्तक में स्पष्ट किया है कि आने वाले समय में विनायक दामोदर सावरकर और महात्मा गांधी के विचारों में टकराव होना तय है। आज भारत गांधी के सत्य के स्वराज को छोड़कर सावरकर के हिंदुत्व के साम्राज्य की ओर तेजी से जा रहा है। ऐसे में वह जहां जाएगा वहां वैज्ञानिक सत्य भी नहीं मिलेगा और आध्यात्मिक सत्य भी नहीं। उसे मिलेगा एक झूठे राष्ट्र का झूठा अहंकार। वैसा भारत अपने भीतर तो बीमार होगा ही और विश्व को कुछ दे नहीं पाएगा। उसका विश्व गुरु बनने का सपना भी चकनाचूर ही होगा। इसलिए आज अगर भारत के विचार को बचाना है तो सत्य को पूर्ण आजादी देने का उद्घोष करना ही होगा।