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आधार की वैधता पर सवाल

युवा संवाद - अक्टूबर 2018 अंक में प्रकाशित

बुधवार को आधार पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस एके सीकरी, मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और जस्टिस एएम खानविलकर की ओर से लिखे गए फैसले में कोर्ट ने कहा कि मोबाइल और बैंक अकाउंट से आधार से लिंक करना असंवैधानिक है, इसलिए इसे हटाया जाता है।कोर्ट ने कहा कि सर्व शिक्षा अभियान और बच्चों के एडमिशन जैसी चीजों के लिए आधार जरुरी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी प्राइवेट कंपनी आधार की मांग नहीं कर सकती है। सीबीएसई और नेट जैसी प्रवेश परिक्षाओं के लिए आधार अनिवार्य नहीं किया जा सकता है। बच्चों के माता पिता की इजाजत लेकर ही दाखिला किया जा सकता है। हालांकि एके सीकरी ने ये भी कहा कि आधार विधेयक को मनी बिल की तरह पास किया जा सकता था।

 

कोर्ट ने आधार विधेयक के अनुच्छेद 47 को भी खत्म कर दिया जिसमें लिखा गया है कि ‘किसी भी काम के लिए।’ कोर्ट ने कहा कि ये कानून नहीं है। कोर्ट ने कहा कि आधार के खिलाफ याचिकाकर्ताओं के आरोप संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर आधारित हैं, जिनके कारण देश शासकीय निगरानी वाले राज्य में बदल जाएगा। कोर्ट ने कहा कि आधार के लिए यूआईडीएआई ने न्यूनतम जनांकीकीय और बायोमिट्रिक आंकड़े इकट्ठा किया है।पीठ ने कहा कि आधार समाज के वंचित तबके को सशक्त बनाता है और उन्हें पहचान देता है। जस्टिस एके सीकरी ने फैसले में कहा, ‘डुप्लीकेट आधार कार्ड प्राप्त करने की कोई संभावना नहीं है।’ उन्होंने कहा कि फैसले में मानव सम्मान के विचार को विस्तार दिया गया है। जस्टिस सीकरी ने कहा कि आधार योजना के सत्यापन के लिए पर्याप्त रक्षा प्रणाली है।जितनी जल्दी संभव हो आंकड़ों की सुरक्षा के लिए मजबूत तंत्र बनाया जाए। पीठ ने निजी कंपनियों को आधार के आंकड़े एकत्र करने की अनुमति देने वाले आधार कानून के प्रावधान 57 को रद्द कर दिया है।

 

कोर्ट ने कहा कि सीबीएसई, नीट, यूजीसी आधार को अनिवार्य नहीं कर सकते हैं और स्कूलों में दाखिले के लिए भी यह अनिवार्य नहीं है। पीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि वह अवैध प्रवासी को आधार नंबर नहीं दे। जस्टिस सीकरी ने कहा, किसी भी बच्चे को आधार नंबर नहीं होने के कारण लाभ/सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता है।

 

न्यायालय ने लोकसभा में आधार विधेयक को धन वियेयक के रूप में पारित करने को बरकरार रखा और कहा कि आधार कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी व्यक्ति की निजता का उल्लंघन करता हो।

 

इस निर्णय के अनुसार आधार कार्ड/नंबर को बैंक खाते से लिंक/जोड़ना अनिवार्य नहीं है।इसी तरह टेलीकोम सेवा प्रदाता उपभोक्ताओं को अपने फोन से आधार नंबर को लिंक कराने के लिए नहीं कह सकते हैं। पीठ ने कहा कि आयकर रिटर्न भरने और पैन कार्ड बनवाने के लिए आधार अनिवार्य है।

संविधान पीठ के सदस्य जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण भी शामिल थे और इस दोनों न्यायाधीशों ने अपने फैसले आधार की वैधता पर सवालअलग-अलग लिखे हैं। हालांकि जस्टिस चन्द्रचूड़ ने कहा कि आधार असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि मनी बिल के आधार पर आधार अधिनियम को पास करना असंवैधानिक है। एक ऐसे विधेयक को मनी बिल के रूप में पारित करना जो कि मनी बिल के रूप में नहीं है, ये संविधान के साथ धोखाधड़ी है।जस्टिस चन्द्रचूड़ ने कहा कि संपूर्ण रूप से आधार कार्यक्रम गोपनीयता और असंवैधानिक का पूरी तरह उल्लंघन करता है।कोर्ट ने कहा कि आधार सरकारी योजनाओं के लिए मांगा जाएगा और अगर किसी का बायोमिट्रिक डेटा फेल करता है तो उसे मात्र इस बिना पर लाभ से वंचित नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति से अन्य प्रमाण पत्र की मांग की जा सकती है।

 

जहां एक तरफ पांच जजों की पीठ में से चार जजों ने आधार की वैधता को संवैधानिक ठहराया, वहीं जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार अधिनियम पूर्ण रूप से असंवैधानिक है अपने सहयोगी जजों के फैसले के विरोध में फैसला सुनाते हुए चन्द्रचूड़ ने कहा, ‘संवैधानिक गारंटी को तकनीकि के उलटफेर से समझौता नहीं किया जा सकता है।’हालांकि बता दें कि बहुमत के विरोध में दिए गए फैसले को कानूनी रूप नहीं दिया जाता है, फिर इससे संभावना होती है कि आने वाले समय में किसी बड़ी पीठ के पास इस मामले को भेजा जा सकता है। चन्द्रचूड़ ने कहा कि आधार अधिनियम का उद्देश्य वैध है, लेकिन उन्होंने कहा कि इसमें सूचित सहमति और व्यक्तिगत अधिकार की रक्षा के लिए पर्याप्त मजबूत सुरक्षा उपाय नहीं हैं।

 

जस्टिस चन्द्रचूड़ ने कहा कि आधार के जरिए आम जनता की निगरानी का संभावना है और ये जिस तरीके से तैयार किया गया है उसके डेटाबेस जानकारी लीक होने की संभावना है। उन्होंने कहा, ‘डाटा व्यक्ति के साथ हर समय निहित होना चाहिए। प्राइवेट कंपनियों को आधार का उपयोग करने की इजाजत देने से प्रोफाइलिंग हो जाएगी, जिसका इस्तेमाल नागरिकों के राजनीतिक विचारों का पता लगाने के लिए किया जा सकता है।’जज ने ये भी कहा कि आधार नहीं होने के कारण सामाजिक कल्याण से जुड़ी योजनाओं से इनकार करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था।उन्होंने कहा कि नागरिकों के आंकड़ों की रक्षा के लिए यूआईडीएआई की कोई संस्थागत जिम्मेदारी नहीं है, उन्होंने कहा कि मजबूत डेटा संरक्षण प्रदान करने के लिए नियामक तंत्र नहीं है।

 

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अनुच्छेद 110 का उल्लंघन  करने के मामले में आधार कानून को खारिज किया जाना चाहिए। इसमें राज्यसभा को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए था। आधार कानून को पारित कराने के लिए राज्यसभा को दरकिनार करना एक प्रकार का छल है।उन्होंने कहा कि आधार कार्यक्रम सूचना की निजता, स्वनिर्णय और डेटा सुरक्षा का उल्लंघन करता है। यूआईडीएआई ने स्वीकार किया है कि वह महत्वपूर्ण सूचनाओं को एकत्र और जमा करता है औ यह निजता के अधिकार का उल्लंघन है।