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दिशा रवि की जमानत और लोकतंत्र

युवा संवाद मार्च 2021 अंक में प्रकाशित

युवा पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि को जमानत देते हुए पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा ने अभिव्यक्ति की आजादी और देशद्रोह के कानून पर जो टिप्पणियां की है उससे आंदोलनकारियों और मीडिया के एक हिस्से में खुशी की लहर दौड़ी है वह स्वाभाविक है। न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणियों से देशद्रोह के कानून के दुरुपयोग और अभिव्यक्ति की आजादी का दमन करने वाली व्यवस्था से लड़ने वालों के लिए खाद पानी का काम किया है। न्यायाधीश ने स्पष्ट किया है कि सरकार की नीतियों की आलोचना और किसी समूह से अनौपचारिक रूप से संवाद करना या जुड़ना तब तक अपराध नहीं हो जाता जब तक उसका उद्देश्य हिंसा भड़काना न हो। जज राणा ने अपनी टिप्पणी में 1942 के देशद्रोह संबंधी मुकदमे निहारेंदु दत्त मजुमदार बनाम सम्राट का उल्लेख किया है और कहा है कि गुलाम भारत में भी इस अपराध के लिए हिंसा एक प्रमुख वजह थी। आजाद भारत में भी केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य और बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जोर इसी बात पर था। कहने का तात्पर्य अगर किसी व्यक्ति का अपने भाषण या अभिव्यक्ति से सरकार के विरुद्ध हिंसा को उकसाना नहीं है तो उसे देशद्रोह की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता। इन तमाम चेतावनियों के बावजूद सरकारें देशद्रोह की विवादित धारा 124 ए को कायम रखे हुए हैं और अपने विरोधियों और आलोचकों पर उसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करती हैं। बाद में अदालतें भले उन आरोपियों को बरी कर दें लेकिन इस बीच उन आरोपियों को काफी समय तक जेल में बिताना पड़ता है। दिक्कत यह है कि इस देश की तमाम जनता और सरकार के समर्थन में काम करने वाले प्रचारक और जनसंपर्क जैसा काम करने वाला मीडिया इस कानून के दुरुपयोग का समर्थन करता है।

 

इसलिए जमानत देते समय एएसजे ने जो टिप्पणियां की हैं उससे आजादी की बहस को बल भले मिले लेकिन उस पर ज्यादा खुशी की जरूरत नहीं है। पहली बात तो यह है कि एएसजे स्तर के न्यायाधीश द्वारा कानून की मेरिट पर टिप्पणी करने का खास न्यायिक अर्थ नहीं बनता। यह देखने लायक बात है कि पुलिस की ओर से लगाए गए तमाम आरोपों के विरुद्ध सबूत के अभाव का अवलोकन करते हुए जज ने जमानत दे दी लेकिन उन्होंने किसी भी आरोप को खारिज नहीं किया है। जबकि जज को यह अधिकार है कि वह चाहे तो पुलिस की ओर से लगाई गए अभियोग को खारिज भी कर सकता है। बल्कि राहत देने वाली क्रांतिकारी टिप्पणियां करने के बावजूद जज राणा ने कहा है कि उनकी टिप्पणियों से मुकदमे की मेरिट पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बस जज ने यह बात जरूर कही है कि इस मामले में अभियुक्त को हिरासत में रखने और जमानत पाने के स्वाभाविक अधिकार को रोक कर रखने का कोई तुक नहीं बनता।

 

 

जज की इन टिप्पणियों से उन तमाम अफवाहों और दुष्प्रचार की हवा तो निकलती हुई लग रही है जो ग्रेट थनबर्ग से लेकर दिशा रवि को देश के विरुद्ध साजिश करने वाले एक्टिविस्ट के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। लेकिन अभी दिशा का मुकदमा चलेगा और पुलिस के आरोपों पर उसे सजा होने की आशंका खत्म नहीं हुई है। न ही इन कानूनों के तहत इसी प्रकार अन्य लोगों पर मुकदमा दायर करने की गुंजाइश बंद हुई है। विडंबना यह है कि हमारा लोकतंत्र इतना बीमार और लाचार होता जा रहा है कि उसके चेहरे पर थोड़ी सी रौनक भी उसके शुभेच्छुओं को खुशी से भर देती है। लेकिन लोकतंत्र अभी अस्पताल से बाहर नहीं निकला है और न ही खतरे से बाहर हुआ है। बल्कि देश में ऐसे डाक्टरों की भरमार है जो लोकतंत्र की इस बीमारी के लिए उसी को दोषी बता रहे हैं। निरंतर देश में ऐसा मानस निर्मित हुआ है कि न बहुत ज्यादा आजादी ठीक है, न ही बराबरी और न ही भाईचारा। हमारा संविधान और हमारा स्वाधीनता संग्राम जिन मूल्यों की स्थापना के लिए कटिबद्ध रहे वे आज सर्वाधिक खतरे में हैं। इसलिए जब तक देश में लगातार पारित किए जा रहे और किसी की उम्र, बीमारी और हिंसा अहिंसा का भेद किए बिना नागरिक अधिकारों का हनन करने वाले कानूनों को लागू किए जाने के विरुद्ध सशक्त जनमत नहीं निर्मित होगा तब तक इन हल्की-फुल्की राहत से कुछ होने वाला नहीं है। अच्छी बात है कि पिछले आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में यह वादा

किया था कि अगर वह सत्ता में आई तो देशद्रोह संबंधी धारा 124 ए को खत्म कर देगी। अब वह कह सकती है कि चूंकि वह सत्ता में नहीं आई इसलिए उसका कोई दोष नहीं है। लेकिन कांग्रेस ने इस देश पर लंबे समय तक शासन किया और उस दौरान उसने उसे खत्म करने का प्रयास क्यों नहीं किया? मौजूदा सरकार इस दलील को बहुत चालाकी से इस्तेमाल करती है। इसलिए आज पूरे देश में इस बात पर एक आम सहमति बननी चाहिए कि लोकतंत्र के जो बुनियादी मूल्य हैं उन्हें कुचलने वाले कानूनों की न सिर्फ न्यूनतम उपस्थिति होनी चाहिए बल्कि उनका दुरुपयोग भी नहीं होना चाहिए।