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फिर गर्त में कश्मीर

युवा संवाद -  जुलाई 2018 अंक में प्रकाशित

‘कश्मीर पर बल द्वारा नहीं, केवल पुण्य द्वारा ही विजय पाई जा सकती है। यहां के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं, न कि शस्त्रधारियों से।’ बारहवीं शताब्दी के मध्य में प्रसिद्ध कश्मीरी कवि एवं इतिहासकार कल्हण द्वारा रचित संस्कृत ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ में कही गई बात कश्मीर की ताजा स्थिति के संदर्भ में भी पूरी तरह प्रासंगिक है लेकिन हकीकत यह है कि भारत की आजादी और भारतीय संघ में कश्मीर के विलय के बाद से ही कश्मीर लगातार बल और छल का शिकार होता रहा है कभी कम तो कभी ज्यादा। यही वजह है कि कश्मीरी अवाम भी हमेशा दिल्ली के शासकों यहां तक कि शेष भारत को भी शक की नजर से देखता रहा है, भले ही हम मौके-बेमौके दोहराते रहे कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। आज तो कश्मीर आवाम का एक बड़ा हिस्सा इतना क्षुब्ध और बेचैन है कि वह भारत के साथ रहना ही नहीं चाहता।

 

कश्मीर को ताकत के जरिए वश में करने का प्रलाप करने वाले लोग हमारे देश में कम नहीं हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुनबे से जुड़े लोगों के अलावा कुछ अन्य तबकों में भी इस तरह के लोग बड़ी संख्या में मिल जाएंगे। लेकिन ऐसा प्रलाप सिवाय पागलपन के कुछ नहीं है। किसी भी राज्य या राज्य के हिस्से को बल-प्रयोग से काबू में नहीं रखा जा सकता। अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ जैसी महाशक्तियों का वियतनाम और अफगानिस्तान में क्या हश्र हुआ, उसे याद रख कर उससे सीखा जा सकता है। किसी को अपना बनाने के दो ही रास्ते दुनिया में अपनाए गए हैं - या तो हिंसा का या प्रेम का रास्ता। हिंसा का रास्ता कभी सफल  नहीं हुआ है। अतः प्रेम का रास्ता ही एकमात्र विकल्प है।

 

इस बात में कोई शक नहीं कि कश्मीर का मसला अपनी विकृति की चरम अवस्था में पहुंच गया है। मौजूदा सरकार और शासक दल के नेताओं के तेवरों को देखते हुए इस स्थिति का कोई तुरत-फुरत हल दिखाई भी नहीं देता। मोदी सरकार ने पिछले चार वर्षों के दौरान कश्मीर को लेकर जितने भी प्रयोग किए हैं, उससे तो मसला सुलझने के बजाय इतना ज्यादा उलझ गया है कि कश्मीर अब हमारे लिए समस्या नहीं रहा बल्कि एक गंभीर प्रश्न बन गया है। वैसे यह प्रश्न बीज रूप में तो हमेशा ही मौजूद रहा लेकिन इसे विकसित करने का श्रेय उन नीतियों को है, जो अंध राष्ट्रवाद और संकुचित लोकतंत्र की देन हैं।

 

जहां तक कश्मीर के मौजूदा हालात के कारणों की बात है, यह तथ्य आइने की तरह साफ है कि कश्मीर के लोगों को पीडीपी और भाजपा की साझा सरकार पर कतई भरोसा नहीं था। अलबत्ता, मुफ्ती मोहम्मद सईद जरूर कुछ सकारात्मक प्रयास करना चाहते थे। उनके मुख्यमंत्री बनने और उनकी सरकार से भाजपा की साझेदारी से कई राजनीतिक समीक्षकों और सत्ताधारी दल के रणनीतिकारों को उम्मीद थी यह गठजोड़ नहीं कामयाबी हासिल करेगा। यह मिथक भी गढ़ा गया कि जम्मू में असर रखने वाली भाजपा और कश्मीर घाटी में मजबूत जनाधार वाली पीडीपी की साझा सरकार बनने से कश्मीर में अमन और सांप्रदायिक सौहार्द कायम होगा। लेकिन सत्ता की इस साझेदारी को आम कश्मीरी आवाम ने पसंद नहीं किया था। एक तरह से इस गठजोड़ का बनना और सत्ता संभालना कश्मीरी आवाम के जले पर नमक छिड़कने जैसा था।

कश्मीर की मौजूदा स्थिति भारतीय राष्ट्र-राज्य के लिए बेहद खतरनाक और चुनौतीपूर्ण है। इसके कुछ बुनियादी कारण हैं। पहला, राजनीतिक संवाद का पूरी तरह बंद किया जाना। यह जानते हुए भी कि कश्मीर का मसला बुनियादी तौर पर राजनीतिक है, मोदी की सरकार बनने के बाद भाजपा सरकार ने अचानक घाटी में राजनीतिक संवाद की प्रक्रिया को पूरी तरह बंद कर दिया। यह स्थिति दोनों स्तरों - कश्मीर के अलगाववादी संगठनों के स्तर पर और पड़ोसी पाकिस्तान के स्तर पर भी दिखीं। पाकिस्तान से राजनयिक वार्ताओं की शर्तें बार-बार बदली गईं। मोदी यह रणनीतिक सोच न केवल दिशाभ्रम की शिकार थी, बल्कि इसमें अतीत की गलतियों से न सीखने की एक जिद भी दिखाई दे रही थी। मोदी सरकार ने इस नजरिए को बदलने में मुख्यमंत्री के तौर पर मुफ्ती मोहम्मद सईद बिलकुल असफल रहे। उनके इंतकाल के बाद मुख्यमंत्री बनीं महबूबा मुफ्ती ने भी भाजपा-संघ की सोच से प्रभावित सरकार की कश्मीर-नीति के आगे आत्मसमर्पण कर दियां इससे कश्मीरी अवाम के बीच उनकी बची-खुची राजनीतिक विश्वसनीयता भी खत्म-सी हो गई। सूबे की मुख्यमंत्री के तौर पर यह राजनीतिक जोखिम लेकर कुछ बड़े कदम उठा सकती थीं, पर उन्होंने समय रहते ऐसा कुछ नहीं किया।

 

अब मोदी की सरकार को समझना होगा कि बंदूकों का जवाब बंदूकें नहीं हो सकतीं। अगर हो सकतीं तो अमेरिका की बंदूकों ने अफगानिस्तान, इराक, सीरिया समेत पूरी दुनिया को अब तक शांत कर लिया होगा। मिलिटेंसी और उग्रवाद से निपटने में सुरक्षात्मक कदम के साथ राजनीतिक पहल की सबसे बड़ी भूमिका होती है। ऐसी पहल कभी आमने-सामने के संवाद के जरिए होती है, तो कभी गोपनीय स्तर पर बंद दरवाजों के अंदर भी। औपचारिक समझौते और अनौपचारिक सहमतियां ऐसे संवादों के अहम हिस्से होते हैं। कश्मीर को लेकर ऐसी राजनीतिक पहलकदमी काफी समय से ‘नई दिल्ली’ एजेंडे से नदारद है।

 

कुछ राजनीतिक विश्लेषक मान कर चल रहे हैं कि अगले वर्ष होने वाले लोक सभा चुनाव में किसी तरह जीत हासिल करने के लिए भाजपा सरकार पाकिस्तान के साथ एक सीमित युद्ध प्रायोजित कर सकती है, लेकिन फिलहाल तो कश्मीर में राज्यपाल का शासन का लागू होने के बाद सैन्य नेतृत्व और सुरक्षा बलों के अफसरों के आ रहे बयानों से लगता है कि मोदी सरकार ने कश्मीरी अवाम से ही युद्ध करने का इरादा बना लिया है।

 

ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पहली बार अर्ध सैनिक बलों की सेना की अगुवाई में कश्मीर घाटी में व्यापक तलाशी एवं अन्य दमनकारी कार्यों में लगाया जा सकता है। अवाम के खिलाफ ऐसे ‘युद्ध’ से भले कोई चुनाव जीत लिया जाए। लेकिन ऐसी कार्यवाइयां कश्मीर को भारत से जुदा करने में ही अहम भूमिका निभा सकती हैं।