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लोकतंत्र की ठिठुरन और युवाओं की आग

युवा संवाद जनवरी 2020 अंक में प्रकाशित

नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के बहाने देश का लोकतंत्र जहां ठिठुरता नजर आ रहा है वहीं युवाओं ने प्रतिरोध का अलाव जला दिया है। इस अलाव ने उन्हें परेशान कर दिया है जो चाहते हैं कि लोकतंत्र इसी तरह ठिठुरता रहे और किसी बाड़े में कैद हो जाए। उनकी इच्छा है कि लोकतंत्र सिर्फ मतदान का एक कार्यक्रम बन कर रह जाए और बाकी समय वह एक संगठन की कथा सुनकर प्रसाद ग्रहण करता रहे। जाहिर है कि प्रसाद सभी को पेट भर नहीं मिलता इसलिए भक्तों का कर्तव्य है कि वे श्रद्धा भाव कायम रखें। पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में फीस बढ़ोतरी के बहाने, फिर नागरिकता के नाम पर जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, इलाहाबाद और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और पश्चिम बंगाल, बंगलुरू, केरल समेत दक्षिण भारत तक फैलने वाला यह आंदोलन क्या है और इसका क्या हश्र होगा इस बारे में तमाम तरह से अनुमान लगाए जा रहे हैं। एक तरफ इसे आजादी की लड़ाई और जेपी आंदोलन के समतुल्य रखा जा रहा है तो दूसरी ओर इसे एनजीओ का आंदोलन बताकर खारिज किया जा रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि यह आंदोलन जितना तेज होगा और इसमें अल्पसंख्यकों की भागीदारी जितनी ज्यादा होगी उतना ही हिंदू ध्रुवीकरण तीव्र होगा और सत्तारूढ़ भाजपा और उनके सहयोगी संगठनों का जनाधार मजबूत होगा। ऐसे लोग राज्य की प्रतिशोधात्मक हिंसा पर चर्चा नहीं करते लेकिन आंदोलनकारियों की छोटी से छोटी हिंसा के आधार पर उनके आंदोलन का औचित्य खारिज करते हैं। दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो कह रहे हैं कि यह देश राजनीतिक लड़ाई हार चुका है और एनजीओ के बहाने अब लोकतंत्र की लड़ाई जीती नहीं जा सकती। ऐसे लोग मानते हैं कि लोकतंत्र अब लंबी अंधेरी सुरंग में प्रवेश कर चुका है जहां दूर तक और देर तक रोशनी की उम्मीद नहीं है। जामिया मिलिया में जिस तरह से छात्रावासों और पुस्तकालय में घुसकर छात्रों का दमन किया गया, उत्तर प्रदेश में गांधीवादी, वामपंथी, समाजवादी और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं

को ढूंढ ढूंढ कर यातना दी गई और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को मारने का सिलसिला चल निकला है उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि राज्य अपनी पूरी ताकत के साथ इस आंदोलन को कुचलने पर आमादा है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और पूर्वोत्तर भारत जहां भी भारतीय जनता पार्टी की सत्ता है वहां नागरिकता के बहाने भेदभाव करने और लोगों को परेशान किए जाने का विरोध करने वालों का दमन चल रहा है। लेकिन यहां यह बात ध्यान देने की है कि असम समेत पूर्वोत्तर राज्यों का विरोध उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से पहले से चल रहा है और उनका एकदम अलग है। वहां के लाखों लोगों ने सूची से बाहर होकर एनआरसी का कड़वा अनुभव किया है और वे उस सीएए से भी भयभीत हैं जो 1985 के असम समझौते को खत्म करने वाला है।

इसके बावजूद उनके प्रतिरोध में हिंसा कम और रचनात्मकता ज्यादा है। असम के संगीतकार, नाटककार, चित्रकार और कवि, कथाकार युवाओं के साथ इस आंदोलन में खड़े हैं और कर्फ्यू तोड़कर हजारों लोग निकल रहे हैं। इसके बावजूद इस आंदोलन के समक्ष जो चुनौती है वह पहाड़ जैसी है। जो लोग सीएए और एनआरसी लागू करना चाहते हैं उनके पास सेना है, अर्धसैनिक बल हैं, पूंजी है, संगठन है, मीडिया है और लोकतंत्र की विविध संस्थाएं हैं। जबकि आंदोलन करने वालों के पास सिर्फ सच्चाई की आग है और लोकतंत्र की परंपरा का आक्सीजन।

 

आंदोलन करने वाले समझ रहे हैं कि सत्ता लगातार झूठ बोल रही है। वह भारत की नागरिकता को धर्म के आधार पर परिभाषित करना चाहती है और द्विराष्ट्र के उसी सिद्धांत को पुख्ता करना चाहती है जिसके तहत भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ। वे यह भी जान रहे हैं कि अगर स्वाधीनता संग्राम में गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने अंग्रेजों से मुक्ति दिलाकर भारतवासियों को प्रजा से नागरिक बनाया तो मौजूदा सत्ता उन्हें फिर से प्रजा बनाना चाहती है। वह पहले यह साबित करना चाहती है कि अरे कांग्रेस पार्टी ने तो आपको नागरिक ही नहीं बनाया और फिर अहसान करते हुए नागरिकता देना चाहती है। इस काम को आगे बढ़ाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सभी हथियारों का सहारा लिया जा रहा है। स्वयं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के बयानों में अंतर्विरोध शीशे की तरह साफ हैं। आप उन्हें झूठ भी कह सकते हैं और जनता को नादान बच्चा समझ कर भटकाने की कोशिश भी। पर एनपीआर और एनआरसी में कोई रिश्ता न बताना, देश में डिटेंशन सेंटर न बताना और 2003 के कानून के तहत बने एनआरसी और एनपीआर को कांग्रेस के समय का बताना यह सब आंख में धूल झोंकने जैसा ही है। इस बीच कांग्रेस पार्टी, बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, ही नहीं एनडीए के जनता दल (यू) और एलजेपी जैसे घटक दल भी सरकार के फैसले से दूरी बनाने लगे हैं। यह एक उम्मीद है लोकतांत्रिक आंदोलन की। आज देश के राजनीतिक दलों के पास यह अवसर है कि युवाओं की सच्चाई की इस आग में अपने को तपाकर पवित्र करें और देश को राजनीतिक विकल्प प्रदान करें। युवाओं के अलाव को दूर से तापने की रणनीति अच्छी नहीं है। उन्हें समझना होगा कि सफाई अभियान में सीमित किए जा रहे महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर अगर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देनी है तो सत्य और अहिंसा के वर्षों पुराने मार्ग पर चल कर देशव्यापी सत्याग्रह खड़ा करना होगा।