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सेबी के सरप्लस पर सरकार की नजर

युवा संवाद - अगस्त 2019 अंक में प्रकाशित

आरबीआई के सरप्लस को लेकर चले लंबे विवाद के बाद रिजर्व बैंक का कैपिटल फ्रेमवर्क तय करने के लिए बनी समिति ने अपना काम पूरा कर लिया है। लेकिन, अभी यह साफ नहीं हुआ है कि आरबीआई रिजर्व से कितने पैसे सरकार को मिलेंगे और कैसे मिलेंगे। यह हो पाए उससे पहले ऐसा ही एक और विवाद चर्चा में है। यह बाजार नियामक संस्था सेबी (भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड) से जुड़ा है। हालांकि इसका फैलाव आरबीआई-सरकार विवाद के मुकाबले काफी छोटा है। सरकार ने बजट में प्रावधान किया है कि सेबी को अपने सरप्लस का 75 फीसद हिस्सा हर साल भारत सरकार की संचित निधि में जमा कराना पड़ेगा। इसके अलावा इस बात का भी निर्देश दिया गया है कि अपने सालाना खर्चों के लिए सेबी को केंद्र की अनुमति लेनी पड़ेगी। आरबीआई के लाखों करोड़ों के अतिरिक्त कोष के सामने सेबी का सरप्लस बहुत मामूली है, लेकिन केंद्र सरकार के इन दोनों फैसलों को एक स्वायत्त संस्था की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप बताने वालों की कमी नहीं है।

 

इस चर्चा ने विवाद जैसी शक्ल लेना तब शुरु किया, जब बजट के इस प्रस्ताव से नाखुशी जताते हुए सेबी कर्मचारियों ने सरकार को च्ठिी लिखी और कहा कि यह प्रावधान मौजूदा सेबी एक्ट की मूल भावना के खिलाफ है। उनका यह भी कहना था कि इससे संस्था की कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ेगा। कर्मचारियों की इस चिट्ठी के बाद सेबी प्रमुख अजय त्यागी ने भी सरकार को इस पर पुनर्विचार करने के लिए पत्र लिखा है। लेकिन केंद्र सरकार ने सेबी कर्मचारियों की इस मांग को अस्वीकार कर दिया है। सेबी के पास पैसे आने के मोटे तौर पर दो तरीके होते हैं। पहला, बाजार नियामक होने के नाते सेबी किसी भी प्रकार की अनियमितता पर जुर्माना लगाती है। दूसरा, सेबी में रजिस्ट्रेशन कराने और अन्य कई तरह के शुल्कों से उसे पैसा मिलता है। जुर्माना या किसी सेटेलमेंट से मिले पैसे को सेबी सरकार को नियमित तौर पर देती रहती है। बाकी रजिस्ट्रेशन, सबस्क्रिप्शन फीस और इक्विटी ट्रांजेक्शन से आने वाले पैसे उसके जनरल फंड में रहते हैं।

 

सेबी स्वायत्त संस्था है और इसी जनरल फंड से अपना खर्च चलाती है। इसके जरिये वह अपने आईटी इन्फ्रास्ट्रकचर, नई तकनीक में निवेश, विधिक सलाह जैसे खर्च भी करती है। अगर इसके बाद भी उसके पास कुछ रकम बच जाती है तो वह उसके पास अतिरिक्त कोष के तौर पर इसी फंड में रखी रहती है। 2017 तक की बैलेंस शीट के मुताबिक सेबी के पास इस समय 3,170 करोड़ रूपये का सरप्लस है। 2018 की बैलेंसशीट के आने के बाद इसमें कुछ सौ करोड़ रुपये और बढ़ने की संभावना है।

लेकिन, अब सेबी को चलाने के इस तौर-रीके में बदलाव की बात की जा रही है। इस बार के बजट में प्रस्ताव किया गया है कि सेबी एक रिजर्व फंड बनाए और उसके जनरल फंड जितना भी सरप्लस है उसका 25 फीसद इसमें स्थानांतरित कर दे। इस रिजर्व फंड में जमा की जाने वाली रकम सेबी के बीते दो वर्षों के सालाना खर्चों से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके बाद उसके पास बच गयी 75 फीसदी सरप्लस रकम को उसे भारत सरकार को देना होगा। इसके साथ यह भी प्रावधान किया गया है कि सेबी को अपने खर्च के लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी।

 

सेबी कर्मचारियों ने सरकार को लिखे अपने पत्र में नये बदलावों से जुड़ी कई चिंताएं व्यक्त की हैं। इस पत्र में कहा गया है कि सेबी का काम बाजार नियामक के तौर पर काम करना और वहां मौजूद प्रतिस्पर्धियों को बेहतर सुविधा देना है। यही सेबी एक्ट की मूल भावना है। लेकिन, सरकार जो नई व्यवस्था कर रही है उससे ऐसा लग रहा है कि सेबी का काम सरकार के लिए राजस्व वसूलना है। हर साल सरकार को पैसे देने से सेबी की आर्थिक स्वायत्तता तो प्रभावित होगी ही, बाजार को बेहतर माहौल देने की उसकी प्रतिबद्धता में भी कमी आएगी। आर्थिक जानकार भी यह मानते हैं कि सेबी का काम सरकार के लिए राजस्व वसूलना नहीं है। लेकिन वित्त विधेयक में हर साल सरप्लस ट्रांसफर करने और खर्च के लिए सरकारी अनुमति लेने की नई व्यवस्था से यह समझ बन सकती है कि इससे भी सरकार का राजस्व बढ़ाया जा सकता है। धीरे-धीरे इसी समझ से सेबी के शुल्क तय होने लग सकते हैं जो बाजार के लिए अच्छी बात नहीं हैं। इसके अलावा बाजार की देखरेख के लिए सेबी को सूचना तकनीक में बड़ा निवेश करना पड़ता है और उसे हमेशा अपडेट रखना पड़ता है। नया प्रस्ताव लागू होने के बाद ऐसा करना आसान नहीं रह जाएगा। माना जा रहा है कि सरकार के इस नये प्रस्ताव का आधार कैग की एक रिपोर्ट है। इसमें कहा गया था कि सेबी, इरडा या इसके जैसी अन्य नियामक एजेंसियों के सरप्लस को भी भारत सरकार की संचित निधि का हिस्सा होना चाहिए। कैग का कहना था कि आर्थिक उदारीकरण के बाद वित्त व्यवहार बदला है इसलिए ऐसी संस्थाओं के अतिरिक्त पैसे भी पब्लिक खाते का हिस्सा होने चाहिए थे। दरअसल कैग की बात का एक अलग संदर्भ था। यह उसकी ऑडिटिंग की चिंताओं से जुड़ा हुआ था जिनके हल दूसरे तरीकों से निकाले जा सकते हैं। लेकिन सेबी जैसी संस्था का स्वायत्त और चुस्त बने रहना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि ऐसा न होने का असर पूरे भारतीय बाजार पर पड़ना तय है। सेबी से पहले आरबीआई, नेशनल सैंपल सर्वे जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता पर भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में आर्थिक ताकत का पूरी तरह से केंद्रीकरण हो जाने की आशंका आर्थिक जानकारों को और भी चिंतित कर रही है।