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रनफरत करने वालों से

युवा संवाद -  अगस्त 2018 अंक में प्रकाशित

शुक्रवार 20 जुलाई को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव भले एनडीए ने जीत लिया हो लेकिन दिल तो राहुल गांधी ने जीता’ है। निश्चित तौर पर नरेंद्र मोदी की सरकार पर राफेल सौदे में भ्रष्टाचार करने, समाज में नफरत फैलाने और किसानों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और महिलाओं पर अत्याचार करने का आरोप लगाने के बाद प्रधानत्री के आसन के पास जाकर उन्हें गले लगाने का अंदाज सत्य और अहिंसा का गांधीवादी अंदाज था और इसी की आज सबसे ज्यादा आवश्यकता है। राहुल गांधी ने जब प्रधानमंत्री को गले लगाया तो वे हतप्रभ थे क्योंकि वे उनके आग्रह के मुताबिक उठकर गले मिलने को तैयार नहीं थे और जब उसके बावजूद राहुल उनके वक्षस्थल पर अपना सीना रखकर उनसे चिपक गए तो प्रेम के इस हथियार से वे परास्त होते नजर आए। उसके बाद उन्होंने राहुल को वापस बुलाकर सहज होने की कोशिश की और फिर लोकसभाध्यक्ष के हाव-भाव ने उन्हें और पार्टी वालों और तीखी प्रतिक्रिया करने का संबल दिया। राहुल का वह अंदाज देखकर जानी मेरा नाम फिल्म का किशोर कुमार का गाया वह गीत याद आ गया कि ‘नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं, अरे मैं वो परवाना हूं जो पत्थर को मोम कर दूं।’ 1970 की इस फिल्म का यह गीत बहुत सुंदर विचार पर आधारित है जिसे गीतकार इंदीवर ने शब्द दिए हैं। लेकिन इस विचार को बीसवीं सदी में सर्वाधिक प्रभावशाली ढंग से अगर किसी ने प्रस्तुत किया था तो वे थे महात्मा गांधी। 30 जनवरी 1948 को हत्या से चंद घंटे पहले जब लाइफ पत्रिका की फोटोग्राफर मारग्रेट बर्क व्हाइट ने उनसे पूछा कि आप परमाणु बम का मुकाबला अपने अहिंसा से कैसे करेंगे तो कहना था कि निश्चित तौर पर मैं डर के मारे घर में नहीं घुस जाऊंगा। बल्कि मैं खुले आसमान के नीचे सीना तान कर खड़ा होऊंगा और बमबर्षक विमान के पायलट को यह दिखाना चाहूंगा कि मेरे हृदय में उसके प्रति कोई कटुता नहीं है। उनका कहना था कि मुझे यकीन है कि अहिंसा और प्रेम की इस गर्मी से उसका पत्थर हृदय जरूर पिघलेगा। राहुल गांधी का संसद में उठाया गया यह कदम उसी भावना का लघु अनुपालन था। उसका तात्कालिक असर प्रधानमंत्री पर नहीं हुआ। जाहिर है कि राहुल गांधी का अंतःकरण गांधी जैसे पवित्र नहीं रहा होगा। अगर होता तो बाद में विजय की भावना से राहुल गांधी अपने कांग्रेसी मित्रों को आंख न मारते। किसी तानाशाह, किसी आतंकवादी, किसी डाकू या क्रूर आक्रांता का हृदय परिवर्तन किसी तरह की जीत नहीं है। वह झूठ और हिंसा के मार्ग पर चल रहे व्यक्ति को सत्य और अहिंसा के मार्ग का अहसास कराना होता है। इसमें जय और पराजय जैसा कुछ नहीं है। वह एक असामान्य स्थिति को सामान्य स्थिति में बदलना है। सत्य और अहिंसा का पालन करने वाला न तो हर क्षण विजय की तलाश में रहता है और न ही हर बात पर वी’ के निशान बनाता है। वैसा काम वे ही करते हैं जो झूठ और हिंसा के रथ पर सवार होते हैं।

 

 

इसलिए राहुल गांधी के इस हाव-भाव को धोबी पाट जैसा दांव बताने वाले भी वैसे ही हैं जैसे मोदी के भाषण को उन्हें धो डालने वाला बताकर गद्गद होने वाले। यह बात जरूर देखने लायक थी कि राफेल डील में गड़बड़ी के आरोप के बहाने मोदी और अमित शाह से कहीं ज्यादा चोट पड़ने वाली थी अंबानी पर। इसीलिए अंबानी की पूंजी से चलने वाले चैनल और तुरंत सक्रिय हो गए और राहुल गांधी के इस दांव को आंख मारने वाली घटना से काटने में लग गए। भारतीय राजनीति में हिंसा, आक्रामकता, नाटकीयता और कठोर भाषा को प्रोत्साहन देने में हमारे चैनला का भारी योगदान है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में निजी चैनलों ने घुटनों के बल तभी चलना शुरू किया था जब मंडल के विरोध में युवा आत्मदाह कर रहे थे और अयोध्या आंदोलन के बहाने कभी शिलापूजन तो कभी बाबरी विध्वंस और कभी दंगे हो रहे थे। संसद में प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव के दौरान चैलनों को नाटकीयता का वह पूरा मसाला मिला जिससे उनका कारोबार चलता है। हालांकि चैनलों ने कृतघ्नता का भाव प्रदर्शित करते हुए उसका श्रेय राहुल गांधी को देने के बजाय फिर उन्हीं नरेंद्र मोदी को दे दिया जो पुराने गाने के एक घिसे हुए रिकार्ड की तरह कांग्रेस पार्टी और नेहरू परिवार के प्रति घृणा के भाव से बाहर ही नहीं निकल पा रहे हैं। मीडिया और राजनेताओं का रिश्ता उस पादरी और शैतान की तरह है जो एक दूसरे के प्रति द्वंद्वात्मक रिश्ता रखने का दावा करते हुए भी एक दूसरे को बचाने में लगे रहते हैं। शैतान के बिना पादरी का कारोबार चल नहीं सकता और पादरी के बिना शैतान अपनी ताकत किस पर दिखाएगा।

 

राहुल गांधी मोदी के गले लगने जरूर गए थे लेकिन मोदीजी कहते घूम रहे हैं कि वे हमारे गले पड़ गए। गले पड़ने का अर्थ है कि वे उनके लिए समस्या बन गए हैं। शायद ऐसा कहते हुए हमारे चैनल और स्वयं मोदीजी भी मुहावरे का पूरा अर्थ समझ नहीं पा रहे हैं। गांधीगीरी चाहे राहुल के गले लगने की हो या सत्याग्रह की वह आज के समय की सबसे अहम जरूरत है। महात्मा गांधी की डेढ़ सौवीं जयंती से ज्यादा इसके लिए कोई उपयुक्त समय हो नहीं सकता। काश! कांग्रेस पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ इस देश के सारे गांधीजन शांति और प्रेम को एक आक्रामक हथियार बनाकर निकल पड़ें तो सचमुच नफरत करने वालों के गले पड़ने वाली स्थिति आ ही जाएगी।